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मैं कम बोलता हूं, पर कुछ लोग कहते हैं कि जब मैं बोलता हूं तो बहुत बोलता हूं. मुझे लगता है कि मैं ज्यादा सोचता हूं मगर उनसे पूछ कर देखिये जिन्हे मैंने बिन सोचे समझे जाने क्या क्या कहा है! मैं जैसा खुद को देखता हूं, शायद मैं वैसा नहीं हूं....... कभी कभी थोड़ा सा चालाक और कभी बहुत भोला भी... कभी थोड़ा क्रूर और कभी थोड़ा भावुक भी.... मैं एक बहुत आम इन्सान हूं जिसके कुछ सपने हैं...कुछ टूटे हैं और बहुत से पूरे भी हुए हैं...पर मैं भी एक आम आदमी की तरह् अपनी ज़िन्दगी से सन्तुष्ट नही हूं... मुझे लगता है कि मैं नास्तिक भी हूं थोड़ा सा...थोड़ा सा विद्रोही...परम्परायें तोड़ना चाहता हूं ...और कभी कभी थोड़ा डरता भी हूं... मुझे खुद से बातें करना पसंद है और दीवारों से भी... बहुत से और लोगों की तरह मुझे भी लगता है कि मैं बहुत अकेला हूं... मैं बहुत मजबूत हूं और बहुत कमजोर भी... लोग कहते हैं लड़कों को नहीं रोना चाहिये...पर मैं रोता भी हूं...और मुझे इस पर गर्व है क्योंकि मैं कुछ ज्यादा महसूस करता हूं!आप मुझे nksheoran@gmail.com पर ईमेल से सन्देश भेज सकते हैं.+919812335234,+919812794323

Saturday, August 4, 2012

कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

हम डरते नहीं एटम बम्ब, विस्फोटक जलपोतो से
हम डरते है ताशकंद और शिमला जैसे समझोतों से
सियार भेडिए से डर सकती सिंहो की औलाद नहीं
भरत वंश के इस पानी की है तुमको पहचान नहीं
भीख में लेकर एटम बम्ब को तुम किस बात पे फूल गए
६५, ७१ और ९९ के युधो को शायद तुम भूल गए
तुम याद करो खेतरपाल ने पेटन टैंक जला डाला
गुरु गोबिंद के बाज शेखो ने अमरीकी जेट उड़ा डाला
तुम याद करो गाजी का बेडा एक झटके में ही डूबा दिया
ढाका के जनरल नियाजी को दुद्ध छटी को पिला दिया
तुम याद करो उन ९०००० बंदी पाक जवानो को
तुम याद करो शिमला समझोता और भारत के एहसानों को
पाकिस्तान ये कान खोलकर सुन ले
की अबके जंग छिड़ी तो सुन ले
नमो निशान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

लाल कर दिया तुमने लहू से श्रीनगर की घाटी को
किस गफलत में छेड़ रहे तुम सोई हल्दी घाटी को
जहर पिला कर मजहब का इन कश्मीरी परवानो को
भय और लालच दिखला कर भेज रहे तुम नादानों को
खुले पर्शिक्षण है खुले शस्त्र है, खुली हुई नादानी है
सारी दुनिया जान चुकी ये हरकत पाकिस्तानी है
बहुत हो चुकी मक्कारी, बस बहुत हो चूका हस्ताक्षेप
समझा दो उनका वरना भभक उठे गा पूरा देश
हिन्दू अगर हो गया खड़ा तो त्राहि त्राहि मच जाएगी
पाकिस्तान के हर कोने में महाप्रलय आजायेगी
क्या होगा अंजाम तुम्हे इसका अनुमान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

ये मिसाइल ये एटम बम्ब पर हिम्मत कोन दिखायगा
इन्हें चलाने जन्नत से क्या बाप तुम्हारा आएगा
अबकी चिंता मत कर चहरे का खोल बदल देंगे
इतिहास की क्या हस्ती है सारा भूगोल बदल देंगे
धारा हर मोड़ बदल कर लाहौर से निकलेगी गंगा
इस्लामाबाद की छाती पर लहराएगा तिरंगा
रावलपिंडी और करांची तक सब गारत हो जाएगा
सिन्धु नदी के आर पार सब भारत हो जाएगा
फिर सदियों सदियों तक जिन्नाह जैसा शेतान नहीं होगा
कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

हिन्दू-स्थान ने ली अब एक नई अंगड़ाई है
भारत माँ के चरणों में ये सोगंध हमने खायी है
आज नहीं तो कल हम अखंड भारत बनायेंगे
सिन्धु को फिर दुबारा गंगा से मिलाएँगे
बंग भंग हुआ था, पाप एक इस धरती पर
दुर्गा की भूमि को पुनः आजाद कराएँगे
खैबर पास और हिन्दुकुश भारत की सीमा होगी
चंहु ओर सनातन और केसरिये की जय जय कर होगी
ये स्वपन एक दिन जरुर साकार होगा
पर उस दिन कश्मीर तो होगा लेकिन पाकिस्तान नहीं होगा

। । भारत माता की जय। ।
। । अखंड भारत की जय। ।

Wednesday, July 18, 2012

जो धरती से अम्बर जोड़े.... उसका नाम मोहब्बत है.......

अभी चलना है रस्ते को मैं मंजिल मान लुं कैसे?
मसीहा दिल को अपनी जिद का कातिल मान लुं कैसे?
तुम्हारी याद के आदिम अंधेरे मुझको घेरे है,
तुम्हारे बिन जो बीते दिन उन्हें दिन मान लुं कैसे ?

मैं उसका हूँ..वो इस अहसास से इनकार करता है..
भरी महफिल में भी रुसवा..मुझे हर बार करता है..
यकीं है सारी दुनियाँ को..खफा है मुझसे वो लेकिन..
मुझे मालूम है फिर भी..मुझी से प्यार करता है... 

बदलने को तो इन आँखो के मंजर कम नहीं बदले..
तुम्हारी याद के मौसम ..हमारे गम नहीं बदले..
तुम अगले जन्म में हमसे मिलोगी..तब तो मानोगी.
जमाने और सदी की इस बदल में हम नहीं बदले।

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ,
तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ,
तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन,
तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ!!

पनाहों में जो आया हो,तो उस पर वार क्या करना?
जो दिल हारा हुआ हो,उस पे फिर अधिकार क्या करना?
मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कशमकश में हैं,
जो हो मालूम गहराई,तो दरिया पार क्या करना? 

जो धरती से अम्बर जोड़े,उसका नाम मोहब्बत है,
जो शीशे से पत्थर तोड़े,उसका नाम मोहब्बत है,
कतरा कतरा सागर तक तो,जाती है हर उमर मगर,
बहता दरिया वापस मोड़े,उसका नाम मोहब्बत है. 

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नही पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मै बह नही पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया यूँ प्यार का क़िस्सा
कभी तुम सुन नही पाई कभी मै कह नही पाया...

मै जब भी तेज़ चलता हूँ नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप गढ़ता हूँ तो साँचे टूट जाते हैं
मै रोता हूँ तो आकर लोग कंधा थपथपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं...

Monday, July 9, 2012

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है........


बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेड़े सह नही पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मै बह नही पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया यूँ प्यार का क़िस्सा
कभी तुम सुन नही पाई कभी मै कह नही पाया

***

मै जब भी तेज़ चलता हूँ नज़ारे छूट जाते हैं
कोई जब रूप गढ़ता हूँ तो साँचे टूट जाते हैं
मै रोता हूँ तो आकर लोग कंधा थपथपाते हैं
मैं हँसता हूँ तो अक्सर लोग मुझसे रूठ जाते हैं


***

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी तो बस बादल समझता है
मै तुझसे दूर कैसा हूँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है


***
मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहा सब लोग कहते है मेरी आँखों में आँसू है
जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है


***
जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल एक ऐसा इकतारा है,जो हमको भी प्यारा है और, जो तुमको भी प्यारा है.
झूम रही है सारी दुनिया, जबकि हमारे गीतों पर,तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या अहसान तुम्हारा है.
***
जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है ,कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उमर मगर ,बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है .
***
पनाहों में जो आया हो, तो उस पर वार क्या करना ?जो दिल हारा हुआ हो, उस पे फिर अधिकार क्या करना ?मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कशमकश में हैं,जो हो मालूम गहराई, तो दरिया पार क्या करना ?
***
बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन,मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन,इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है,एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन.
***

तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ,तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ,तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन,तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ

एक बार कर के ऐतबार लिख दो,
कितना है मुझसे प्यार लिख दो,

कटती नहीं ये ज़िन्दगी अब तेरे बिन,
कितना करू और इंतज़ार लिख दो,

तरसते रहे है बड़ी मुद्दत से,
इस बार अपनी मोहब्बत का इज़हार लिख दो,

ज्यादा नहीं लिख सकते तो मत लिखो तुम,
मोहब्बत भरे लफ्ज़ दो चार लिख दो,

एक बार लिखो मोहब्बत है मुझे तुमसे,
फिर यही जुमला बार बार लिख दो।

Monday, February 13, 2012

वेलेंटाईन दिवस - दिल तो दिल है, दिल का ऐतबार क्या क्या कीजै


देश एक बार फिर वेलेंटाइन दिवस के चपेटे में है!
वेलेंटाइन-बुखार में जकड़ गया है देश
लैला सा पागलपना,मजनू जैसा भेस,
मजनू जैसा भेस कि सब बौराये हुये हैं
प्रेम,प्यार, स्नेह,खुमारी मे लिपटाये हुये हैं,
कह ‘अनूप’ सब मिलि चक्कर ऐसि चलाइन,
देश के सब प्रेमी भू्ल गये बस याद रहे वेलेंटाइन!
चारों तरफ़ वातावरण वेलेंटाइन मय हो रहा है। हवाऒं में सरसराहट बढ़ गयी है। स्पेशल आर्डर देकर देश में इंद्र भगवान से पानी का छिड़काव करवाया गया है। फसलें पानी में भीग-भीग कर इतनी इतनी खुश हो गयीं हैं कि खुशी के मारे जमीन में लोट-पोट हो रही हैं। वी आई पी इलाकों में ऒले भी गिरवाये गयें। चारों तरफ़ फूलों से हंसते रहने के लिये बोल दिया गया है। कलियां से मुस्कराने को कहा गया है। भौंरों से कहा गया है कि कलियों पर मंडरायें लेकिन जरा तमीज़ से! सारा तमाशा होगा लेकिन कायदे से। सारा काम प्रोटोकाल के हिसाब से होगा।
आनंद पर अनुशासन की निगाह रहेगी। ये नहीं कि भौंरा किसी झरते हुये फूल पर अलसाया सा बैठा है और उधर कोई कली अपने सौंन्दर्य पर खुद ही रीझते हुये खीझ रही है। हर एक से उसके पद की गरिमा के अनुरूप आचरण होगा। हां,तितलियों को आजादी है कि वे जिसके ऊपर चाहें -मंडरायें।
आनंद पर अनुशासन की निगाह रहेगी। ये नहीं कि भौंरा किसी झरते हुये फूल पर अलसाया सा बैठा है और उधर कोई कली अपने सौंन्दर्य पर खुद ही रीझते हुये खीझ रही है। हर एक से उसके पद की गरिमा के अनुरूप आचरण होगा। हां,तितलियों को आजादी है कि वे जिसके ऊपर चाहें -मंडरायें। फूल, कली, भौंरा किसी के भी चारों तरफ़ चक्कर लगायें। तितलियां बगीचे की ‘बार- बालायें’ होती हैं वे कहीं भी आ-जा सकती हैं।
कहते हैं कि वेलेंटाइन दिवस संत वेलेंटाइन की याद में मनाया जाता है। उनके समय में सैनिकों के शादी करने पर रोक थी लेकिन संत वेलेंटाइन उनकी शादी चोरी-छिपे करा देते थे। एक बार शादी करवाते राजा ने उनको पकड़ लिया और उनकी बरबादी हो गयी। १४ फरवरी के ही दिन उनका फांसी पर लटकाया गया इसलिये यह दिन उनके नाम पर मनाया जाता है।
सन्त वेलेंटाइन मरे १४वीं सदी में और उनके नाम का दिन मनाना शुरू हुआ १७ वीं सदी से। भारत में तो पिछ्ले आठ-दस साल में शुरू हुआ। हाय, बताओ हमारे देश के लोग छह सौ साल गफलत में पड़े रहे। दुनिया से हम तीन सौ साल पीछे हो गये। तीन सौ साल दुनिया वालों ने ज्यादा प्रेम कर लिया और हम भुक्क बने ताकते रहे। लगता है प्रेम हो या तकनीक हर मामले में पिछड़ जाना हमारी नियति है।
लोग पूछते हैं प्रेम के लिये हम संत वेलेंटाइन का मुंह काहे ताकते हैं। वे खुद तो सीधे प्रेम करते नहीं थे। प्रेम करने वालों को मिलवाते थे। मध्यस्थ थे। इसके मुकाबले हम कॄष्ण को काहे नहीं पूजते हैं जो खुद प्रेम के प्रतीक थे। कृष्ण तो वेलेंटाइन से पहले की पैदाइश हैं, सीनियारिटी के लिहाज से भी उनका हक बनता है प्रेम दिवस पर। वे सौन्दर्य के भी प्रतीक हैं , प्रेम के भी, दोस्ती की मिसाल भी है उनकी, महाभारत के अप्रत्यक्ष सूत्रधार भी। जब-जब भारत में धर्म की जरा सी भी हानि हुयी, फट से आकर धर्म की स्थापना कर दी। हर मामले में वेलेंटाइन से बीस। फिर भी ये प्रेम दिवस उनके हाथ से फिसलकर वेलेंटाइन की गोद में कैसे जा गिरा। हम कैसे उनको छोड़कर वेलेंटाइन के खेमें में आ गये?
हम कहते हैं भैये ये ‘करनेवाले‘ और ‘करवाने वाले’ का अंतर है। कॄष्ण सारे काम खुद करते थे। जबकि वेलेंटाइनजी काम करवाते थे। कॄष्ण प्रेम करते थे, वेलेंटाइनजी प्रेम करवाते थे। कॄष्ण ने सोलह हजार शादियां खुद कीं जबकि वेलेंटाइनजी अपनी तो एक भी नहीं की और जो शादियां करायी उनकी संख्या कहो चार अंकों तक भी न पहुंची हो। इसके बावजूद हमारे यहां ‘प्रेम दिवस’ कॄष्णजी के नाम पर न रखकर वेलेंटाइन जी के नाम पर रखा जाता है तो इसका कारण सिर्फ और सिर्फ एक है वह यह कि अपने देश में करने वाले से करवाने वाला हमेशा बड़ा होता है।
चारों तरफ़ फूलों से हंसते रहने के लिये बोल दिया गया है। कलियां से मुस्कराने को कहा गया है। भौंरों से कहा गया है कि कलियों पर मंडरायें लेकिन जरा तमीज़ से!
फिर जो ‘ग्रेस’ वेलेंटाइन की दुग्ध धवल दाढ़ी है वह भला कृष्ण की दुध मुंही तस्वीर में कहां। हम अपने नायकों को अपनी मर्जी के सांचे में ढाल कर पूजते रहने के आदी हैं। कॄष्ण को देश कभी घुट्नों से ऊपर उठने की नहीं देता। ‘किलकत कान्ह घुटुरुवन आवत’ और ‘मोर मुकुट, कटि काछनी,कर मुरली उर वैजंती माल’से ज्यादा जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाती कॄष्णजी को। उनको चिर-नाबालिग या फिर सजावट का सामान बना रखा है उनके भक्तों ने!
यह दुनिया जानती है कि वेलेंटाइन दिवस का प्रेम से कोई लेना-देना नहीं है। यह वेलेंटाइन दिवस नहीं ‘उपहार दिवस’ है। ‘बाजार दिवस’ है। यह ‘वेलेंटाइन डे’ नहीं ‘मार्केट डे’ है। क्या बात है कि आप अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिये कार्डों के मोहताज हो जाते हैं! कार्ड नहीं तो प्रेम नहीं । ग्रीटिंग कार्ड वह सुरंग हो गयी है जिससे होकर ही दिल के किले पर फतह हासिल हो सकती है।
प्रेम के लिये केवल एक दिन रखना प्रेमियों के साथ निहायत नाइंसाफ़ी है। लेकिन लोग इसी में राजी हैं तो कोई क्या कर सकता है। लोग इसी दिन अपना प्रेम दिखा कर छुट्टी कर लेना चाहते हैं।

प्रेमिका को सिस्टर बता गए: हास्य कविता

अब क्या बताए जब से हमारे एक दोस्त नेता हुए हैं एक नंबर के झुठे हो गए है. एक समय था जब भाई शर्मा जो आजकल लोकल एमएलए की चापलूसी करके अपनी पार्टी का नया प्रत्याशी बना है वह कभी स्कूल में हरीशचंद का रोल करता था नाटक में. लेकिन आज तो उसने झुठ बोलने में मिसेज कौशिश की लवली बहू का भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है.


अभी कल ही की बात है जनाब हमारे साथ घूम रहे थे कि इतने मॆं एक मोहतरमा आई और उन्हें नमस्ते करके चली गई. पूछने पर बोले मुहंबोली बहन है. लेकिन हम तो जानते थे भैया मैटर कुछ और है. अब उनकी इस स्थिति पर हमें प्रसिद्ध कवि हास्य कवि काका हाथरसी की एक कविता याद आई है जिसे मैं यहां दे रहा हूं.



हास्य कवि हाथरसी की प्रेमिका को सिस्टर बता गए:



सीधी नजर हुयी तो सीट पर बिठा गए।
टेढी हुयी तो कान पकड कर उठा गये।



सुन कर रिजल्ट गिर पडे दौरा पडा दिल का।
डाक्टर इलेक्शन का रियेक्शन बता गये ।



अन्दर से हंस रहे है विरोधी की मौत पर।
ऊपर से ग्लीसरीन के आंसू बहा गये ।



भूंखो के पेट देखकर नेताजी रो पडे ।
पार्टी में बीस खस्ता कचौडी उडा गये ।



जब देखा अपने दल में कोई दम नही रहा ।
मारी छलांग खाई से “आई“ में आ गये ।



करते रहो आलोचना देते रहो गाली
मंत्री की कुर्सी मिल गई गंगा नहा गए ।



काका ने पूछा ‘साहब ये लेडी कौन है’
थी प्रेमिका मगर उसे सिस्टर बता गए।।

Sunday, January 1, 2012

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!


  • भगवान करे ये साल आपको रास आ जाये;
    जिसे आप चाहते हो, वो आपके पास आ जाये!
    आप नए साल में कुंवारे न रहे;
    आपका रिश्ता लेकर आपकी सास आ जाये!
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!

  • बीत गया जो साल, भूल जाए;
    बीत गया जो साल, भूल जाए;
    इस नए साल को गले लगाये!
    करते है दुआ हम रब से सर झुका के;
    इस साल के सारे सपने पूरे हो आपके!
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!

  • दस्तक दी, किसी ने कहा सपने लाया हूँ;
    खुश रहो आप हमेशा, इतनी दुआ लाया हूँ!
    नाम है मेरा एस सम एस,
    आपको `हैप्पी न्यू इयर` विश करने आया हूँ!
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें! 

  • पुराना साल सबसे हो रहा है दूर;
    पुराना साल सबसे हो रहा है दूर!
    क्या करें यही है कुदरत का दस्तूर;
    पुरानी यादें सोचकर उदास न हो तुम!
    नया साल आया है चलो...धूम मचाले, धूम मचाले धूम!  

  • एक - खूबसूरती!
    एक - ताजगी!
    एक - सपना!
    एक - सच्चाई!
    एक - कल्पना!
    एक - अहसास!
    एक - आस्था!
    एक - विश्वास!
    यही है एक अच्छे साल की शुरुआत!
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें! 

  • नव वर्ष की पावन बेला में, है यही शुभ सन्देश;
    हर दिन आये आप के जीवन में, लेकर खुशियाँ विशेष!
    नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!
      

  • Tuesday, December 20, 2011

    RO RO KAR PUKAR RAHA HOON

    ro ro kar pukar raha hoo
    hame jami se mat ukharo
    rakt sraw se bheeg gaya hoo
    hame kulhari ab mat maro
    aamaa ke badal se poochho
    mujhako kaise pala hai
    har mausam me seechaa mujhako
    mitti karkat jhaaraa hai
    us mand hawao se poochho
    jo jhula hame jhulaya hai
    tum bhee apane aangan me
    pero ka baag ugaa lo
    ro ro kar pukar raha hoo
    hame jami se mat ukharo
    is dhara ki sundar chaayaa
    ham pero se bani huyee hai
    kan-kan ki mand hawaye
    amrit ban kar chali huyee hai
    hame se naataa hai jan jan ka
    jo dhara pe aaye ge
    hami se rista hai pag pag me
    jo yaha se jaayege
    sakhaaye aandhee tufano me tuti
    thooth aag me mat daalo
    ro ro kar pukar raha hoo
    hame jami se mat ukharo
    hame karate sab prani ko
    amrit ras ka paan
    hami se banati kitani ausadhi
    nayee panapati jaan
    kitane fal phool ham dete
    fir bhee anjaan bane ho
    liye kulhari khare huye ho
    uttar do kyo bejaan khare ho
    hami se sundar jiwan milata
    buri nazar hampe mat dalo
    ro ro kar pukar raha hoo
    hame jami se mat ukharo
    agar jami par nahi rahe ham
    jeena dubhar ho jaayegaa
    trahi-trahi jan jan me hogi
    haahaakaar bhee mach jaayegaa
    fir pachhato ge tum bande nahak
    hamane inhe bigaaraa
    hame se ghar dhar sab milataa hai
    khara huaa hai jo dwaar kiwara
    gali gali me per lagaao
    har prani me ek aash jagaa do
    ro ro kar pukar raha hoo
    hame jami se mat ukharo

    Abhee to kaliyaa khil rahee hai

    Abhee to kaliyaa khil rahee hai,,
    Fool to aa jaane do
    Fir aa ke rash choos lena
    Abhee jara muskaane do
    Har adaa pe mugdh huye ho
    Palako par mujhe bithao ge
    Apani baaho me lekake
    Mera din bahalaao ge
    Abhi na roko rasta mera
    Pahale ghar ko jaane do
    Abhee to kaliyaa khil rahee hai,,
    Fool to aa jaane do
    Tumhe dekh kar chanchal ho gayee
    Bhool gayee kuchh laaz ko
    Ghar waalo ke baag lagaayee
    Arpit kar dee aap ko
    Abhee hawa purwa doli hai
    Mujhe jara ithlaane do
    Abhee to kaliyaa khil rahee hai,,
    Fool to aa jaane do
    Wah din jald hee aayegaa
    Jab meri maang sajao ge
    Apane haatho se amrit rash
    Sajan mujhe pilayo ge
    Subah to meri rah na roko
    Saanjh jara ho jaane do
    Abhee to kaliyaa khil rahee hai,,
    Fool to aa jaane do

    Monday, December 5, 2011

    मास्टर जी

    1. एक बै एक छोरा स्कूल नहीं आया । आगलै दिन मास्टर नै पूछा - रै, कल स्कूल क्यूं ना आया था?
    बाळक बोल्या - मास्टर जी, म्हारी भैंस नै काटड़ा दिया था ।
    मास्टर बोल्या - इसमैं के खास बात हो-गी ?
    बाळक नै जवाब दिया - जी, खास बात ना सै, तै आप दे कै दिखा दो !!

    2.
    एक बै स्कूल में मास्टर जी नै एक छोरे तैं बूझा - "कपड़ा किसे कहते हैं ?"
    छोरा बोल्या - जी बेरा कोनी ।
    मास्टर गुस्से में हो-कै बोल्या - तेरी पैंट किस चीज की बनी है ?
    छोरा बोल्या - जी, मेरे बाबू की पुरानी पैंट की !!

    3.
    एक भूगोल की मास्टरनी घणी पतली, बोद्दी-सी थी, जमा आइसक्रीम के लीकड़े जिसी । क्लास नै पाछले दिन का पाठ दोहरावै थी । बोली - बोलो बच्चो, धरती क्यूं घूमती है ?

    एक छोरा बोल्या - मैडम, किमैं खा-पी लिया कर, ना तै न्यूं-ऐं घूमती दीखैगी !!

    4.
    भाइयो, हुया न्यूं अक एक-बै रात के बखत एक स्कूल की छात (छत) पड़-गी । तड़कैहें-तड़कैहें जब बाळक स्कूल में गये तै घणे कसूते राजी हो रहे थे, अर मेरे-मटे कूदते हांडैं - अक भाई यो तै कसूत काम हो-ग्या, ईब कई दिनां ताहीं पढ़ाई ए ना हो । सारे मास्टर अर हैडमास्टर खड़े हो-कै देखण लाग रहे - अर बाळकां के तै चेहरे कत्ती सिरसम के फूल जिसे खिल-रे थे ।
    इतने में हैडमास्टर नै बगल में देख्या अक एक छोरा घणा मुरझाया सा, घणा भूंडा दुखी-सा, अर फूट-फूट कै रोवण लाग रहा था । ईब हैडमास्टर जी नै सोची अक यो छोरा तै घणा बढ़िया, पढ़णियां सै, अर बेचारा घणा दुख मान रहया सै स्कूल के नुकसान होवण का ।
    हैडमास्टर आगै गया, उस नै डाटण खातिर, अर जा-कै बोल्या - "बेटा, दुखी मतना हो, मैं समझूं सूं तन्नै कितना दुख सै अक यो सारे गाम का नुकसान सै, अर ईब पढ़ाई कई दिनां ताहीं रुक ज्यागी । पर बेटे, मैं नई छत जितणी जलदी हो सकैगी, बणवा दूंगा" ।
    छोरा एकदम तैं रोणा छोड कै बोल्या - "अरै ना मास्टरजी, इसा जुलम मतना करियो । मैं तै न्यूं रोऊं था अक मुश्किलां-सी तै छात पड़ी, अर मास्टर एक भी ना मरया" !!

    5.
    एक बै एक स्कूल में नाटक होया । उस नाटक में एक छोरी नै बूआ का रोल करना पड़-ग्या । फिर यो बूआ का रोल करे पाच्छै सारी क्लास के बाळक उसनै "बूआ-बूआ" कह कै छेड़ण लाग्गे ।
    उस छोरी नै दुखी हो कै एक दिन मास्टर ताहीं बता दी अक - जी, ये सारे मन्नै बूआ-बूआ कह कै छेड़ैं सैं ।
    मास्टर कै ऊठ्या छो, अर बोल्या - "अरै, खड़े हो ज्याओ जुणसे-जुणसे इसनै बूआ कहैं सैं" ।
    सारी क्लास खड़ी हो गई, बस एक छोरा पाच्छै-सी बैठ्या रह-ग्या । मास्टर उस छोरे नैं बोल्या - क्यूं रै, तेरा के चक्कर सै ?
    वो छोरा सहज-सी आवाज में बोल्या "जी, ये जुणसे खड़े सैं ना, मैं इन सारयां का फूफा सूँ !!

    6.
    एक छोरा क्लास में घणा बोल्या करता । उसका मास्टर बोल्या - रै छोरे, तेरै या बीमारी कित्तैं लाग्गी ?
    छोरा बोल्या - जी या तै खानदानी सै । मेरा दादा वकील था अर मेरा बाबू मास्टर, उनकै भी या बीमारी थी ।
    मास्टर बोल्या - अरै, तेरी मां तै ठीक-ठाक होगी ?
    छोरे नै जवाब दिया - "जी, वा तै औरत सै" !!

    7.
    हिसाब का मास्टर तीसरी क्लास नै पढ़ावै था । बाळकां तैं बूझण लाग्या - दो रुपये का एक किलो गुड़ आवै सै, तै पच्चीस पईसे का कितना आवैगा ?"

    थोड़ी हाण पाच्छै एक छोरे नै हाठ ठाया । मास्टर बोल्या - शाबाश लीलू, बता बेटा ।

    लीलू – मास्टर जी, बताऊं ? दो छोटी-छोटी डळी अर थोड़े से भोरे !!

    हमारे मास्टर जी और उनका निकर

    आज भी याद आती है मुझे अपने स्कूल के दिनों की। गढ़वाल की एक सुंदर सी पहाड़ी के ऊपर एक समतल स्थान पर था हमारा जूनियर हाई स्कूल (आठवीं तक) , तीन तरफ से छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा हुआ। अच्छा ख़ासा मैदान बना था। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़, सामने उत्तर में विशाल हिमालय। दक्षिण में जंगल, जहां काफल, बांज, बुरान्स के लाल लाल मन मोहक फूल। जैसे कुदरत ने अपनी सारी संपदा यहीं आकर बिखेर दी हो। चार बजे स्कूल की छुट्टी होती थी, जिन बच्चों के घर नज़दीक थे वे तो अपने घर चले जाते थे, जो दूर से आते थे वे वहीं राशन-पानी और बिस्तरा के साथ आते थे और वहीं स्कूल में ही रहते थे।

    हेड मास्टर जी के साथ एक अंग्रेज़ी के सर भी रहते थे। हमारे हेड मास्टर जी का नाम था गेन्दा राम। कहते हैं जब वे पैदा हुए थे, उस समय उनके घर के बाहर कुछ लड़के गेंद खेल रहे थे। गेंद उछल कर उनके पास आकर रुक गयी थी। बस उनके पिता जी ने उनका नाम उसी समय गेन्दा राम रख दिया था। उनके पास एक फ़ौजी निकर थी, जो उन्हें उनके दादा जी ने दी थी। जो फौज में हवलदार मेजर थे और वॉलीबॉल खेलते थे। उनकी दिली इच्छा थी कि मेरा पोता बड़ा होकर वॉलीबॉल और मेरा नाम रोशन करे।

    जिस दिन से उनके दादा जी ने उन्हें यह निकर उन्हें दिया था उसी दिन से उन्होंने वॉलीबॉल खेलना शुरू किया। निकर उनके घुटनों से नीचे तक आती थी। उनके दादा तो खूब मोटे तगड़े थे, लेकिन मास्टर गेंदराम जी दुबले-पतले थे। पेट कमर जैसे उनकी थी ही नहीं। फिर भी शाम को रोज स्कूल बंद होते ही वे निकर पहन कर वॉलीबॉल नेट पर खड़े हो जाते थे। निकर ढीली थी, डोरी से कमर पर कस कर बांध देते थे। अमूमन वे नेट पर बॉल मारते थे और उन्हें मारने के लिए उछलना पड़ता था। जैसे ही वे उछलते थे उनकी निकर नीचे आ जाती थी और वे उछलकर उसे ऊपर खिसका देते थे।

    हमेशा ऐसा ही होता था और एक दिन, जैसे मास्टर जी ने बॉल मारी और निकर ऊपर खिसकाने लगे, तभी नेट पर बॉल फिर आ गई। उन्होंने निकर छोड़ कर उछाल मारी और बॉल नेट के पार। पॉइंट मिल गया, लेकिन मास्टर गेन्दा राम जी का निकर, रस्सी सहित नीचे धरती पर आ गिरा। खूब ताली बजी, मास्टर जी ने भी बजाई। दर्शकों ने मास्टर जी की निकर को और मास्टर जी ने गेम जीतने को।

    मास्टरजी

    आज पता नहीं क्यों बारिश की बौछार रुकने का नाम ही न ले रही थी। अनामिका को कल होने वाली परीक्षा की चिंता थी। सुबह से ही वह गणित के पुस्तक के पन्नों को बार-बार पलटकर उसके सवालों को हल किए जा रही थी। अंकगणित व बीजगणित के प्रश्न तो आसानी से हल हो रहे थे पर, ज्यामिति उसके लिए एक सिरदर्द बनकर खड़ा हुआ था। लाख कोशिशों के बावज़ूद ज्यामिति का वह प्रश्न हल नहीं हो पा रहा था। उसे लगने लगा कि वह अपने प्रथम स्थान को कायम न रख पाएगी। अब वह पूछे तो भला किससे ? उस गाँव में तो उसकी मदद करनेवाला भी तो कोई न था। वृक्ष, लता-गुल्मों से हरे-भरे उस गाँव में कृषि विशेषज्ञ तो कई थे पर, गणित...
    तभी उसे स्वरूप मास्टरजी का खयाल आया। वे गाँव में प्राइवेट ट्यूशन का कारोबार करते थे। उस कारोबार से उनकी आमदनी भी अच्छी ही थी। अनामिका के बाबूजी को कई बार उन्होंने कहा था कि उसकी पुत्री को वे उनके पास भेज दिया करें पर, अनामिका को अपने स्वाध्याय पर विश्वास था। आज उसका विश्वास डगमगा गया था। सोचा उनके यहाँ जाकर क्यों न उनसे सहायता ली जाए। परन्तु, साथ ही एक संकोच-बोध से उसका मन भर गया। उन्होंने तो उसे कई बार बुलाया था; वही तो नहीं गई थी। फिर सोचा, मास्टरजी ही तो हैं, अवश्य उसकी सहायता करंगे। इसी उधेड़-बुन में संध्या होने को आई। अबकी वह निश्चय कर चुकी थी कि वह उनसे सहायता लेने अवश्य जाएगी।
    मास्टरजी का घर गाँव के दूसरी छोर पर था। वहाँ वे एकांतवास किया करते थे। बस सुबह और शाम को बच्चों की शोरगुल से आभास होता था कि वहाँ कोई रहता भी है, अन्यथा वह क्षेत्र वीराना ही था। लोगों का मानना था कि मास्टरजी बड़े शांतिप्रिय थे, इसलिए उन्होंने इस वीराने में ही अपना आशियाना बनाया था।
    अब भी मूसलाधार बारिश हो रही थी। शाम का समय और उसपर रह-रहकर जोरदार मेघ-गर्जन उस वातावरण को और भी भयावह बना रहे थे। अनामिका इंतज़ार कर रही थी कि कब बारिश रुके। संयोग से बारिश काफ़ी धीमे हो गई। अनामिका ने अपनी किताब व कॉपी उठाई और तेज़ कदमों से मास्टरजी के घर की ओर चल दी। घर से निकलने समय उसकी माँ ने उससे पूछा भी कि वह कहाँ जा रही है? उसने चिल्लाकर कहा कि मास्टरजी के यहाँ। माँ निश्चिंत हो गई। तेज़ कदमों से वृक्ष के झुंडों, लता-गुल्मों को पार करते हुए वह बढ़ी जा रही थी। अचानक, रुकी बारिश फिर से तेज़ हो गई। आधा से अधिक रास्ता बीत चुका था, इसलिए वह न लौटी। अपनी किताब-कॉपी को संभालते हुए अख़िरकार पानी से पूरी तरह तर-बतर मास्टरजी के घर के दरवाज़े पर पहुँच चुकी थी। अंधेरा बढ़ चला था। बारिश की वज़ह से आज मास्टरजी का कारोबार ठप्प पड़ा था। पूरी नीरवता व्याप्त थी। बस, बारिश की रिमझिम ही पूरे परिवृत्त में मौज़ूद थी। फिर से अनामिका के मस्तिष्क में वही द्विधा-बोध, जो घर से निकलने से पहले थी, जागृत हुई। पर, दृढ़ निश्चय कर उसने उनका दरवाज़ा खटखटाया। मास्टरजी निकले। यह उन दोनों का प्रथम साक्षात्कार था। तभी बिजली चमकी। उसके प्रकाश में गीले कपड़ों में लिपटा नवम की छात्रा अनामिका का जिस्म देख मास्टरजी की आँखें चमक उठीं। मास्टरजी ने उससे अंदर आने को कहा। थोड़ी ही देर बाद तीक्ष्ण आवाज़ से पूरा परिवेश गुँजायमान हो गया – ये क्या कर रहे हैं आप... आह... बचाओ... मत कीजिए ऐसा... बचाओ... बचाओ...
    अगली सुबह बलात्कृत निर्वस्त्र अनामिका अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ निढाल हो चली जा रही थी परीक्षा देने...

    Sunday, December 4, 2011

    Yara Mera Birthday Bhool Na Jana

    Yara Mera Birthday Bhool Na Jana
    Dua Karna Aur Hamey Batana

    Kuch Likh Doh Hamarey Liye Bhi Chain Aa Jayega
    Warna Ek Shaam Fir Uski Yaad Meh Yuhi Beet Jayega

    Kabhi Pehley Hum Yu Dua Maanga Nahi Kartey They
    Saath They Unkey Toh Fir Socha Nahi Kartey They

    Aaj Tanha Yu Reh Gaya Hu
    Aap Key Saharey Ji Gaya Hu

    3rd December Koh Born Huye They
    Sapney Hazaar Buney Huye They

    Aap Ki Mehfil Meh Sajney Aa Gaye Hai
    Yaaro Galey Lagao Apna Banney Aa Gaye Hai

    Tuesday, February 8, 2011

    प्यार भरे दिन का प्यारा सा इतिहास



    प्यार का दिन, प्यार के इजहार का दिन। अपने जज्बातों को शब्दों में बयाँ करने के लिए शायद इस दिन का हर धड़कते हुए दिल को बेसब्री से इंतजार होता है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं, प्यार के परवानों के दिन की, वेलेंटाइन-डे की...। प्यार भरा यह दिन खुशियों का प्रतीक माना जाता है और हर प्यार करने वाले शख्स के लिए अलग ही अहमियत रखता है।

    14 फरवरी को मनाया जाने वाला यह दिन विभिन्न देशों में अलग-अलग तरह से और अलग-अलग विश्वास के साथ मनाया जाता है। पश्चिमी देशों में तो इस दिन की रौनक अपने शबाब पर ही होती है, मगर पूर्वी देशों में भी इस दिन को मनाने का अपना-अपना अंदाज होता है।

    जहाँ चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्स' प्यार में डूबे दिलों के लिए खास होता है, वहीं जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइट डे' का नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, इन देशों में इस दिन से लगाए पूरे एक महीने तक यहाँ पर लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं और एक-दूसरे को तोहफे व फूल देकर अपनी भावनाओं का इजहार करते हैं।

    इस पर्व पर पश्चिमी देशों में पारंपरिक रूप से इस पर्व को मनाने के लिए 'वेलेंटाइन-डे' नाम से प्रेम-पत्रों का आदान प्रदान तो किया जाता है ही, साथ में दिल, क्यूपिड, फूलों आदि प्रेम के चिन्हों को उपहार स्वरूप देकर अपनी भावनाओं को भी इजहार किया जाता है। 19वीं सदीं में अमेरिका ने इस दिन पर अधिकारिक तौर पर अवकाश घोषित कर दिया था।

    यू.एस ग्रीटिंग कार्ड के अनुमान के अनुसार पूरे विश्व में प्रति वर्ष करीब एक बिलियन वेलेंटाइन्स एक-दूसरे को कार्ड भेजते हैं, जो क्रिसमस के बाद दूसरे स्थान सबसे अधिक कार्ड के विक्रय वाला पर्व माना जाता है।

    ऐसा माना जाता है कि वेलेंटाइन-डे मूल रूप से संत वेलेंटाइन के नाम पर रखा गया है। परंतु सैंट वेलेंटाइन के विषय में ऐतिहासिक तौर पर विभिन्न मत हैं और कुछ भी सटीक जानकारी नहीं है। 1969 में कैथोलिक चर्च ने कुल ग्यारह सेंट वेलेंटाइन के होने की पुष्टि की और 14 फरवरी को उनके सम्मान में पर्व मनाने की घोषणा की। इनमें सबसे महत्वपूर्ण वेलेंटाइन रोम के सेंट वेलेंटाइन माने जाते हैं।

    1260 में संकलित कि गई 'ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन' नामक पुस्तक में सेंट वेलेंटाइन का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार शहंशाह क्लॉडियस के शासन में सेंट वेलेंटाइन ने जब ईसाई धर्म को अपनाने से इंकार कर दिया था, तो क्लॉडियस ने उनका सिर कलम करने के आदेश दिए।

    कहा जाता है कि सेंट वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जेकोबस को एक पत्र लिखा, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था 'तुम्हारा वेलेंटाइन'। यह दिन था 14 फरवरी, जिसे बाद में इस संत के नाम से मनाया जाने लगा और वेलेंटाइन-डे के बहाने पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम का संदेश फैलाया जाता है।

    Saturday, December 18, 2010

    प्रदर्शन छोड़िए, हमारी खेल भावना तो देखिए श्रीमान्

    और लो साहब, दक्षिण अफ्रीका पहुंचते ही टीम पहले ही टेस्ट में ढह सी गई। हालांकि अभी दूसरी पारी बाकी है। लेकिन दिग्गज तू आया मैं चल की तरह एक के बाद एक चल ही दिए। क्यों भई...टीम इंडिया नहीं जानती क्या कि पूरा देश आंखें दताए बैठा है टीवी के सामने...बस इन्हीं मौकों पर देश बड़ा कसकर आध्यात्मिक हो जाता है। एक लौ सी लगा लेता है...लागी तुमसे मन की लगनटाइप।



    खेल तो बाबू अच्छा ही रहे थे...एक हताशा सी तारी हो जाती है देश पर, गुरू अभी लक्ष्मण ठोकेगा देखना...फिर भी एक उम्मीद कायम रहती है। खैर, खेल छोड़िए, इस खेल के पीछे छुपी खेल की आध्यात्मिकता पर चलिए एक नजर डालते हैं...टीम खराब खेल रही है तो क्या तुम क्यों आशाएं लगाए हो...फिर देखो तो आशाएं खुद लगाते हो बोझ हम पर डाल देते हो...कितना बोझ उठाएं....अपेक्षाओं का, सालभर तो दनादन ठोकते रहते हैं रन देश में इतने से मन नहीं भरता आपका कि दक्षिण अफ्रीका की सीरिज देखने दते हो.. ये नहीं देखते कि हम पर कितना बोझा है...






    इस विचार के साथ देश दुखी हैं...खिलाड़ी दुखी हैं... दोनों ही गमगीन रहने के खेल में लगे हैं। हालांकि खिलाड़ी तो फिर भी 10-12 एड, कुछ रियलटी शो, एकाधा फैशन शो में रैंप पर चलने जैसा कुछ करके अपने गम भुलाएंगे। लेकिन देशवासी फालतू के चिंतन में लगातार जुटे रहेंगे। खिलाड़ी से सीख नहीं लेंगे जो ऐसी स्थति आने या हारने के कुछ देर बाद ही भूल जाते हैं। हार की पीड़ा को सीने से चिपकाए गली-चौराहे-पान की दुकानों पर चर्चान्वित नहीं रहते।






    लेकिन भिया मेरा तो मानना है कि हमें हार से इतर खेल भावना पर विचार करना चाहिए। हमारे खिलाड़ी कितने सीधे-सच्चे होते हैं। देश के लिए खेलते समय परमार्थ की कैसी जबर्दस्त भावना दिखाते हैं। बैटिंग करते समय सोचते हैं कि ले भाई, तेरी खुशी मेरे जल्दी आउट होने में है, तो कर ले मुझे आउट, बस खुश। हालांकि गेंद भी तो पता नहीं सामने वाले कितनी तेज फेंकते हैं।






    गोली सी दनदनाती मुंह के सामने से निकल गई अभी मुंह पे चोट लग जाती तो अगला विज्ञापन...और फिर देखो तो हाथ की हड्डियां जाने कहां से ऑर्डर देकर बनवाते हैं। हम तो पता नहीं इतनी तेज गेंदें फेंक दें, तो चौथ ओवर के बाद ठीक से स्ट्रेचर पर भी लेट पाएंगे कि नहीं। उधर, मैदान में खिलाड़ी भी लगातार एड मनी का जोड़-घटाना करता रहता है। प्रायोजकों की अपेक्षाओं की चिंता करता रहता है। इसी प्रताप से तो कई टूटे-फूटे पड़े हैं। इसके बावजूद भी भावना देखिए हमारेवालो की, सारा जोर सामने वाले को खुश रखने में लगाए रहते हैं।






    खिलाड़ियों की विनम्रता पर भी अलग से नजर डालिए आप, मजाल है कि कभी इस बात का एहसान जताएं। आपके ज्यादा जोर देने पर ही चट्टान जैसी पिच पर दोष लगाना शुरू करते हैं कि नहीं?, ज्यादा पूछने पर ही तो अपने कोच पर आरोप मंढते हैं कि नहीं? बहुत ज्यादा ही सवाल किए जाते हैं तभी ना सही बताते हैं कि क्या करें वो शॉर्ट पिच गेंदें डाल रहा था, उसकी मेहनत का सम्मान तो करना ही था। फील्डर भी कुछ ज्यादा ही जुझारू दिख रहा था।






    मैदान पर लोट-लोट कर बॉल रोक रहा था। कई बार समझाया भी कि क्यों भाई ऐसा क्या कि जान देते पड़े हो, पेंट भी नया बनवाया दिखता है, लेकिन इतने समझाने का असर भी नहीं, तो क्या करें, फिर मजबूरी में उसका भी सम्मान रखना पड़। ऐसे शॉट लगाने पड़े कि उसे गेंदों के लिए मैदान पर भूलुंठित होने की जरूरत ही ना पड़े, सारे शॉट सीधे उसके हाथ में जाएं। उसका सम्मान न करें, रन बनाएं, ऐसा हमसे न हो पाएगा। तो ऐसी है हमारे वालों की उदार भावना।






    ऐसे ही सामनेवालो की बल्लेबाजी के दौरान हम नितांत दार्शनिक हो जाते हैं। शत्रु पक्ष का समझकर भी तेरी तरफ मित्रवत् गेंद फेंकी है-का भाव रखते हैं। (हालांकि जोर तो पूरा लगाया था, इससे ज्यादा तेज गई ही नहीं) फिर गेंद फेंक दी है, तू कर ले मनमानी, जैसी उदारता भी रखते हैं। अब सामने वाला निर्ममता से प्रहार करता रहता है, तूफानी शतक ठोक देता है...तो क्या करें।






    कई बार धीरे से उसके पास जाकर समझाते भी हैं, अब बस कर रे, हमारी आईपीएल की टीम में आने के लिए इतना ही काफी है। और अगर पहले से है तो भी समझाते हैं कि बढ़ावा देंगे रे तेरा मेहनताना अगली बार जरा सबर तो कर ले....लेकिन कई बार हमारी अंग्रेजी या उसकी श्रवण शक्ति कमजोर होने के कारण यह बात वो ठीक-ठाक तरीके से शायद समझ नहीं पाता है, और रन ठोकता रहता है।






    हम तो पूरे प्रयास करते हैं, अब हमारी किस्मत से वो बहरा निकल आया, क्या करें जी। और ऐसे ही ये इतने मंहगे नए पैंट क्या बॉल घिसने या जमीन पर लोटने के लिए बनवाए हैं। अब क्या अंतरराष्ट्रीय मैचों के स्तर पर आकर भी वो गंवारों जैसा जमीन पर ऊंचे-नीचे कूदते रहें। नईं, आप ही बताओ? अरे, वो बात अलग थी, जब देश की टीम में आना था। तब पैंट सस्ता था, इच्छाशक्ति मजबूत थीं।






    ऊपर से देश के लिए खेलने का जज्बा अलग हिलोरे मार रहा था। अब क्या यहां आकर भी मैचों जैसा गंवारूपना करते दिखें। टीवी पर ये सब करते अच्छा नहीं लगता भिया। तो इस तरह से इतने गहन दर्शन के तहत हमारे वाले उन्हें जिता देते हैं। आप फिजूल में टीम की हार के गम में गलते रहते हो।

    Friday, December 17, 2010

    अंग्रेज चले गए जी. बी. रोड छोड़ गए

    गार्सटिन बैसन रोड – अंग्रेज कलेक्टर के नाम रखी इस सड़क की ख्याति जी. बी. रोड के नाम से अधिक है। लाल किला, कुतुबमीनार, जंतर मंतर, चांदनी चौक, कनॉट प्लेस की तरह यह भी दिल्ली की पहचान का पुराना और अहम हिस्सा है। उसकी पुरानी रवायत का एक बदनाम सफा जिसके बारे में जानते तो सब हैं मगर बात कोई नहीं करना चाहता।
    अब देखिए न पहचान बदलने के खयाल से सरकार ने सोचा नाम बदल दिया जाए। नाम रखा गया श्रद्धानंद मार्ग। पैंतालीस साल हो गए नाम आज तक लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ा। यह अलग बात है कि सड़क के निशान, दुकानों के नामपट्ट सब इसका पता श्रद्धानंद मार्ग ही बताते हैं। लेकिन… कलेक्टर गार्सटिन साहब जरूर नेकदिल इंसान रहे होंगे, तभी तो आज तक उनका नाम लोगों की जुबान से नहीं उतरा।
    अंग्रेज चले गए रोड छोड़ गए…
    जी. बी. रोड की तफ़रीह न सही सैर करनी हो तो रिक्शे की सवारी ही सबसे शान की सवारी है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन या नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के बाहर निकलकर कमला मार्केट चौक पर आइए। दस रुपए देकर रिक्शे पर बैठिए खारी बावली के लिए, मसाले, ड्राई फ्रूट के बडे थोक बाज़ार के लिए। बीच में करीब तीन किलोमीटर लंबी सड़क आती है जो जी. बी. रोड मेरा मतलब है श्रद्धानंद मार्ग कहलाती है। हार्डवेयर के इस मशहूर मार्केट में आगे चलकर बीस इमारतें आती हैं, जिनकी पहली और दूसरी मंजिल के तकरीबन सौ कोठों(अब ९६ हैं, कुछ साल पहले तक इन कोठों की संख्या १०८ थी) के कारण ही जी. बी रोड की असली शोहरत और बदनामी है। शाम ढलने के बाद नीचे दुकानों के शटर गिरने लगते हैं, ऊपर की मंजिलों के झरोखे रोशन होने लगते हैं। झरोखों से इशारे करती लड़कियाँ बता देती हैं जी. बी. रोड की रुसवाई का चर्चा क्यों है। शाम के बाद कमला मार्केट चौक से खारी बावली तक की गई यात्रा याद रह जाती हैं।
    रिक्शेवाले इस रोड की समझ लीजिए जान हैं। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन, कमला मार्केट, नया बाजार, सदर बाज़ार सब मिलाकर इधर करीब एक हजार रिक्शेवाले होंगे। वैसे जबसे चांदनी चौक में रिक्शे का चलना बंद हुआ है तबसे इन इलाकों में रिक्शेवालों की तादाद बढ़ गई है। जी. बी. रोड के जीवन से गहरा रिश्ता है इन रिक्शेवालों का है। शाम ढलने के बाद ज्यादातर कस्टमर इन पर सवार होकर ही आते हैं। दिन के वक्त इन कोठेवालियों का सबसे बड़ा सहारा भी रिक्शेवाले ही बनते हैं। यह दिलचस्प है कि औरतों के इतने बड़े बाजार होने के बावजूद यहाँ एक ब्यूटी पार्लर तक नहीं है। दिन के वक़्त ऊपर रहने वाली औरतें उतरती हैं और चुपचाप इन्हीं रिक्शों पर सवार होकर पुरानी दिल्ली के दूसरे बाजारों में सौदा-सुलुफ करने के लिए निकल जाती हैं। उन बाजारों में जहाँ उनको कोई नहीं जानता, कोई नहीं पहचानता। आसपास के उन दुकानों, बाजारों में वे नहीं दिखाई देती हैं जो उनके ही दम से चल रही हैं। सब्जी तक खरीदने के लिए वे सीताराम बाजार जाती हैं। कम से कम चार किलोमीटर दूर। एक हनुमान मंदिर, चार मस्जिद होने के बावजूद ये कोठेवालियाँ इबादत के लिए भी यहाँ के इबादतखानों में नहीं जातीं। उनके भगवान भी यहाँ से दूर ही बसते हैं…
    वैसे बाजार सीताराम से दुकानदारी के उनके इस रिश्ते की कहानी पुरानी दिल्ली वाले दूसरी ही बताते हैं। बीसवीं शताब्दी की आजादी के कुछ साल पहले तक आज कागज़ वगैरह के बड़े बाजार के रूप में प्रसिद्ध चावड़ी बाजार में तवायफ़ों का कोठा था। आज भी चावड़ी बाजार के ऊपरी मंजिलों के झरोखों को देखकर सहसा जी. बी. रोड के कोठों की याद आ जाती है। वैसे ही झरोखे, वैसी ही झिरियाँ। तब सीताराम बाजार के पास होने से वहाँ की तवायफ़ों को सीताराम बाजार में जाने की आदत पड़ गई। बाद में सरकार ने जिस्म के इस बाज़ार को आबादी से दूर थोक बाजारों के इस गोल में लाकर बसा दिया। पचास-साठ साल हो गए, पीढ़ियाँ आईं-गईं, लेकिन सीताराम बाजार जाने की आदत नहीं गई। आपने भी सुना होगा पुरानी आदतें जाती नहीं हैं।
    बाहर से आने वाले यहाँ गर्दन ऊपर उठाकर चलते हैं, लेकिन यहाँ की कोठेवालियाँ रिक्शे पर बैठकर गर्दन झुकाए गुजर जाती हैं। ‘अपने’ मुहल्लेवालों से शायद शर्म आती हो। कई बार जब कोई लड़की कोठे से भागती है तो अक्सर इन्हीं रिक्शों पर सवार होकर निकल जाती है। पिछले दिनों जब अखबार में यह खबर पढ़ी कि जी. बी. रोड के इलाके में दो पुलिस वालों की हत्या हो गई और पुलिस वालों ने हत्यारों की तलाश में सारे इलाके को घेर लिया था। एक अखबार में लिखा था पुलिसवालों का झगड़ा कोठा नंबर ६४ में हुआ था। कोठा नंबर ६४ का जिक्र पढ़कर पिछले साल की रिक्शा यात्रा और रिक्शेवाले से हुई बात याद आ गई – सबसे नामी कोठा है ६४ नंबर। वहाँ तो एसी भी है, विदेशी कस्टमर आते हैं। वैसे ज्यादा काले विदेशी ही होते हैं – अफ्रीका वाले। वहाँ का रेट भी हाई है! कोठा नंबर ६४ जी. बी. रोड के हाई-फाई कल्चर का प्रतीक है।
    असल में बीस इमारतों और ९६ कोठों वाले इस बाजार में अमीर-गरीब की खाई है। कमला मार्केट की तरफ रिक्शे पर करीब आधी दूरी तय करने के बाद हनुमान मंदिर आता है। कोठा नंबर ६४ उसके बाद पड़ता है। हनुमान मंदिर के दूसरी तरफ की कोठेवालियों की ठसक कुछ ज्यादा है क्योंकि उनमें ज्यादातर गोरी लड़कियाँ धंधा करती हैं – जी. बी. रोड पर धंधे के लिए लाई जाने वाली लड़कियों में बड़ी तादाद नेपाल, आसाम से आई लड़कियों की है, उनमें से अधिकतर हनुमान मंदिर के दूसरी ओर के कोठों में पाई जाती हैं। उनकी तलाश में इधर शहर के रईसजादों की आमदरफ्त भी लगी रहती है। रिक्शे पर बैठकर… मंदिर के इधर वाली बाइयों का रेट कम से कम २०० तक भी हो सकता है तो मंदिर के उधर की गोरी लड़कियाँ एक-एक ग्राहक से दो-दो हजार तक वसूल लेती हैं। कोठा नंबर ६४ से ध्यान आया करीब दो साल पहले पुलिस ने जी. बी. रोड पर छापा मारकर करीब दो सौ कमसिन लड़कियों को मुक्त करवाया था। सबसे ज्यादा ४० नेपाली लड़कियाँ कोठा नंबर ६४ से मुक्त करवाई गई थीं। तब एक रिक्शेवाले ने ही इलाके में काम करने वाले एक एनजीओ को उस कोठे में रहने वाली कम उम्र की लड़कियों के बारे में बताया था, शक्तिवाहिनी नामक उस संस्था के दबाव पर ही पुलिस ने कोठों पर छापा मारा था।
    इंटरनेट और मोबाईल फोन के इस दौर में ज़िस्म का व्यापार भी हाईटेक हो गया है। जी. बी. रोड पर भी इसका असर पड़ रहा है। यहाँ धीरे-धीरे रिक्शेवालों की मिल्कियत खत्म होती जा रही है। अब ऑटोरिक्शा की आमद इस इलाके में बढ़ने लगी है। कोठेवालियाँ मोबाईल पर कस्टमर से सौदा तय करती हैं और बन-संवरकर ऑटो में सवार होकर किसी अनजान स्थान के लिए निकल पड़ती हैं। अब यहाँ आना ग्राहकों के लिए पहले जैसा निरापद नहीं रहा। जी. बी. रोड गांजा, चरस, स्मैक जैसे नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार का भी बड़ा सेंटर बन चुका है। इसकी वजह से यहाँ अपराध की घटनाएँ बढ़ने लगी हैं। पहले कस्टमर के जान-माल का ध्यान कोठेवालियाँ और उनके दलाल रखते थे क्योंकि उनसे ही उनकी रोजी-रोटी चलती है। अब दलाल ही उनको लूटने लगे हैं। इसलिए लोग यहाँ आने से घबड़ाने लगे हैं। लड़कियों के लिए भी बाहर जाना फायदे का सौदा लगने लगा है। एसी रूम मिलता है, अच्छा पैसा मिलता है। इसलिए उनके व्यापार को अब रिक्शेवालों से अधिक अधिक ऑटोवाले भइया भाने लगे हैं। वे ही उनके लिए कस्टमर भी तय करते हैं, उनको गाड़ी में बिठाकर ले जाते हैं, फिर वापस भी छोड़ जाते हैं।
    लेकिन ऑटो में वह मज़ा कहाँ जो रिक्शे में है। रिक्शे पर बैठकर तो खुला आसमान दिखाई देता, झरोखे से झांकती, इशारे करती लड़कियाँ भी। रिक्शे पर बैठकर यहाँ से गुजरने का खयाल बुरा नहीं है… शाम के बाद… जब हार्डवेयर बाजार बंद होने लगता है… नशेड़ियों, भिखमंगों, पुजारियों,  व्यापारियों, ठेलेवाले, चाट-खोमचेवालों की भीड़ और उनके बीच टुनटुन घंटी बजाकर जगह बनाता रिक्शा…